ये गहरा लाल रंग🔴




हथेली पर रेड डॉट बनाकर ये कौन सा चैलेंज पूरा कर रही हैं महिलाएं?जब से लॉक डाउन लगा है तब से महिलाएं हो या पुरूष प्रधान सभी सोशल मीडिया पर किसी न किसी चैलेंज को स्वीकार रहे। लेकिन यह हथेली पर रेड डॉट बनाकर ये कौन सा चैलेंज है अब!खबरों की मानें तो यह इंस्टाग्राम का लेटेस्ट चैलेंज है जो बहुत ही अच्छी वजह से चर्चा में मशहूर हो रहा है जहाँ बॉलीवुड की अभिनेत्रियों से लेकर आमजनमानस अभिनेत्रिया इसमें भाग ले रही है। दरअसल, आज 29 मई को पूरी दुनिया में ‘International Menstrual Hygiene Day’ मनाया जा रहा। उसी कड़ी में UNICEF ने ये" रेड डॉट चैलेंज" शुरू किया।चलिए तो शुरुआत करते है इस चन्द लाइन से पूरे चैलेंज की कहानी को, ठीक वैसे ही जैसे अक्सर पिक्चर कहानी के अंत से शुरू होती है, उसे ही कहते फ्लेशबैक...!

ये गहरा लाल रंग!
ही स्त्री की पहचान है।
माँग हो या बिंदिया,या हाथो की हो चुड़िया,
ये लाल रंग अभिशाप नही,वरदान है।
स्त्री में स्त्री होने की पहचान है।
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पीरियड शब्द दिमाग में आते ही या सुनते ही सबसे पहले
दिमाग मे सौ तरह की उलझने शुरू हो जाती है। कुछ महिलाएं पीरियड्स को लेकर बहुत ज्यादा ही परेशान होती है। असहनीय दर्द,एक्ने, माइग्रेन, डिप्रेशन, हैवी ब्लीडिंग,आदि जैसी समस्याएं दिमाग में उनके उलझन लाने लग जाती हैं।लेकिन बदलते परिवेश में आज अधिकतर महिलाओं को पीरियड्स के दौरान इन सभी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।जिसका बहुत ही सामान्य कारण है महिलाओं की बदलती लाइफस्टाइल व खानपान की आदतें और बढ़ते प्रदूषण के कारण उनका मासिक चक्र बिगड़ जाता है।

पूरे घर का ध्यान रखने वाली ये महिलाएं स्वयं से जुडी कई जरूरी बातों से या तो अंजान रहती है या अनदेखा करती हैं। कई बार पीरियड्स बोलना ही शर्म से जुड़ जाता है,आज भी माँ आंखे बड़ी और भौहे चढ़ा घूर ही देती है जब भी मैं पूरे परिवार के सामने गर्व से पीरियड्स के बारे में नाम या बात कर लूं तो, घर मे मानो भूचाल सा आ गया हो।आखिर क्यों हम महिलाएं पीरियड्स पर खुल कर बात नही कर सकते?क्यों ये महिला चैन बनकर रह रहा।जहाँ आज महिलाएं सेनेटरी पैड्स को लेकर हाथ मे सेल्फी लेती हो?आज भी ऐसी कई महिलाएं है जो अज्ञानता व खुले तौर पर इन विषयों पर चर्चा नही कर पाती या शायद करना नही चाहती।कुछ महिलाओं को इस मुद्दे पर बात करने में भी बहुत हिचकिचाहट महसूस होती है। लज्जा के कारण वे इन्हें ना जाने क्यों छिपाए पड़ती है,वो भी किस्से।

आज पीरियड्स के बारे में कौन पुरूष प्रधान नही जानता या समझता। फिर भी क्यों है इस मुद्दे पर खुलकर विचार रखने पर रोक- टोक।इसी रोक- टोक को देखते हुए इस चैलेंज को बढ़ावा दिया गया, जिसमे महिलाए बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही।इस रेड डॉट चैलेंज का मतलब साफ है,पीरियड्स के प्रति घृणा,इससे जुड़ी शर्म और इसके बारे में बात ना कर पाने की बंदिश को तोड़ना। अभिनेत्री दिया मिर्जा सोशल साइट्स पर अपनी फोटो शेयर करते हुए लिखती है कि, “पीरियड्स से जुड़ी शर्म को खत्म करने के साथ ही जरूरी है ऐसे प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल में लाना जो पर्यावरण के लिए घातक ना हों। मैं बायोडिग्रेडेबल पैड यूज करती हूं, बहुत से लोगों ने मेंस्ट्रुअल कप इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। ये भी जरूरी है कि ऐसे प्रोडक्ट लोगों की पहुंच में हों।”वही अभिनेत्री कुब्रा सैत लिखती है कि इन दो महीनों में घर पर बैठे हुए उन्हें आराम करने का मतलब पता चला। वो कहती हैं कि पीरियड्स के दौरान खूब पानी पीना और शरीर को आराम देना है बहुत जरूरी।वही इसी तरह के कई पोस्ट कल से वायरल हो रहे कि; “अब समय आ गया है कि पीरियड्स से जुडी शर्म को खत्म किया जाए,फुलस्टॉप लगाया जाए।”

इसकी शुरुआत अपनी हथेली में लाल रंग का एक बड़ा सा डॉट बनाकर माहवारी के दौरान लड़कियों में सफ़ाई रखने का संदेश देने के लिए किया जा रहा।यह चुप्पी तोड़न चैलेंज के तहत माहवारी के दौरान सैनिटरी पैड की उपयोगिता,व हर लड़की को अपनी शरीर के बारे में सटीक जानकारी रखने का हक।वाक़ई अब समय है चुप्पी तोड़ने का,और खुलकर विचार साझा करने का क्योंकि माहवारी ज़रूरी है। समाज मे अभी भी महिलाओं के जीवन चक्र से जुड़े इतने अहम मुद्दे पर बात करने में लोगों को झिझक महसूस होती है।महिलाएं अपनी माहवारी से जुड़ी दिक्कतों और परेशानियों को खुलकर साझा नहीं कर पातीं।जिसका नतीजा उनकी खराब सेहत के रूप में एक दिन सामने आ ही जाता है। इस चैलेंज को शुरू करने का उद्देशय महज यह है कि इस मुद्दे पर खुलकर बोला जाए। लोगों को बताया जाए कि पीरियड्स के दौरान ऐसे पैड का इस्तेमाल किया जाए जो बायो ग्रेडेबल हों।

इन्ही चुप्पी के वजहो से कई बार मासिक धर्म से संबंधित कई बातो को लेकर गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं। मासिक धर्म में महिलाओं को कई चीजों से दूर रखा जाता है। जिस वजह से वे खुद को अपवित्र मानती हैं और इस दौरान बरते जाने वाले एहतियातों पर ध्यान भी नहीं देती। इस तरह उनका खुद का स्वास्थ्य खतरे में पड जाता है।आज भी कई महिलाएं मासिक धर्म में कपडे का इस्तेमाल करती हैं। बाद में इस कपडे को ना वे धोती है ना सुखाती है जिस वजह से इसमें जीवाणु पैदा हो जाते हैं। इस गंदे कपडे का पुनः उपयोग उन्हें कई जानलेवा बीमारियों की चपेट में ला खड़ा करता है। अतः हम महिला मित्रों को ही पीरियड्स के दौरान स्वच्छता बनाए रखने के लिए खुद सचेत रहना है।

ये गहरे रंग 🔴की कैसे हुई थी शुरुआत?

 महिलाओं के जीवन में मासिक धर्म उनकी प्रकृति से जुड़ी प्रक्रिया है। हर साल 28 मई व 29 मई को पूरी दुनिया में 'मासिक धर्म स्वच्छता दिवस' मनाया जाता है। इसकी शुरुआत साल 2014 में जर्मन एनजीओ 'वॉश यूनाइटेड' ने की थी। इसको मनाने का उद्देश्य उन पाँच दिनों से जुड़ा है जो लड़कियों/महिलाओं को पीरियड्स में स्वच्छता और सुरक्षा के लिए जागरूक करता है। आमतौर पर महिलाओं के मासिक धर्म 28 दिनों के भीतर आते हैं, और इसका पीरियड पांच दिनों का होता है। इसी कारण इस खास दिवस को मनाने के लिए पांचवें महीने मई की 28 व 29 तारीख चुनी गई।

आज भी पीरियड्स के बारे में बात करने में न केवल गांवों में बल्कि शहरों में भी बहुत सारी महिलाएं झिझकती हैं। इस दौरान उन्हें क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इस बारे में वे नहीं जानतीं ना ही चर्चा करना चाहती हैं। इस तरह बहुत सारी महिलाएं खुद के स्वास्थ्य को खतरे में डाल देती हैं। पीरियड्स के दौरान होने वाले संक्रमण से खुद को बचाएं जाने के लिए स्वच्छता बेहद जरूरी है,दूसरा योग।

गांवों और छोटे शहरों में बहुत सारी महिलाएं पीरियड्स में कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। इस कपड़े का दुबारा इस्तेमाल करने के लिए इन्हें धोने के बाद छिपाकर सुखाने के चक्कर में खुली हवा या धूप नहीं लग पाती;ऐसे में इसके इस्तेमाल से गंभीर संक्रमण हो सकता है। 
लेकिन पीरियड के दौरान कपड़े की जगह पैड का इस्तेमाल करना सुरक्षात्मक होता है। लेकिन यहाँ भी सावधानी बरतनी होती है पैड्स को बदलना होता है,ऐसा इसीलिए क्योंकि लंबे समय तक एक ही पैड को लगाने से पसीने के कारण पैड नम रहता है।जिससे वेजाइना में संक्रमण होने का खतरा रहता है। इसलिए 6-8 घंटे में महिलाओं को अपना पैड बदलना जरूरी होता है,जिससे संक्रमण का खतरा नहीं रहता।इन्ही के साथ महिलाओं को पीरियड के दौरान अपने संवेदनशील अंगों की सफाई विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए।क्योंकि पीरियड्स के दौरान सफाई ज्यादा अहम हो जाती है। ब्लीडिंग के कारण अंगों में लगे खून को साफ करना जरूरी होता हैं। जिससे दुर्गंध भी नहीं पैदा होती।ऐसे में साबुन की जगह केवल गुनगुने पानी से सफाई ही काफी होती है। कई बार महिलाएं कई कारण से पैड्स बदल नही पाती ,जिससे पीरियड्स में ज्यादा बहाव के दौरान बार-बार पैड बदलने के झंझट से बचने के लिए कुछ महिलाएं दो पैड का इस्तेमाल करती हैं, जो गलत तरीका है। एक पैड की सोखने की क्षमता जितनी है, उतना ही सोखेगा। दो पैड एक साथ लगाने से संवेदनशील अंग के पास गर्मी बढ़ेगी,इससे बैक्टीरिया ज्यादा पनपेंगे और दुर्गंध भी।दो पैड से असुविधा भी महसूस हो सकती है। कभी भी गीले पैड को लंबे समय तक इस्तेमाल करने से जांघों और गु्प्तांगों पर लाल चकत्ते पड़ना शुरू हो जाते हैं।जिससे जलन होना खुजली होना शुरू होता हैं तो इससे बचे।

ख़ास बात यह है कि इस्तेमाल किए गए पैड को सदैव पेपर या नैपकिन में लपेटकर कूड़ेदान में फेंकें।साथ ही पीरियड्स के दिनों में अपने बैग में हमेशा एक्स्ट्रा सेनेटरी नैपकिन, टिश्यू पेपर, हैंड सैनिटाइजर, एंटीसेप्टिक दवा वगैरह रखें।जिससे जरूरत पड़ने पर आप असहजता ना महसूस करें।और अपनी सभी महिला मित्रों,बहनों से आग्रह करती हूं आप भी इस पर खुलकर बात करे,शर्म नहीं।

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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️