ससुराल के व्यंग्यबाण | कहानी -7



रोज की तरह किचन में खटरपटर करती जिया रुआँसे मन से बड़बड़ाई मेरी तो कोई इज्ज़त ही नही करता इस घर मे।  क्यों ,तुम कौन सी बहुत बड़े पद पर हो जो तुम्हे कोई इज्जत दे पीछे खड़ी सास ने तपाक से जवाब दिया। इतना सुनते जिया पहले सकपकाई कि अरे ये कहा से आ गयी लेकिन उसने आज हिम्मत दिखाते हुए पलट कर जवाब दिया- सही बात है मम्मी जी आजकल तो समाज और ससुराल पद और पैसों तक ही सीमित हो चुका है। इंसानियत ये तो पता नही किस खेत का मूली है। जिया का इतना बोलना कि सासूमाँ टिनक गयी।अक्सर लोग बुरा जल्द ही मान जाते हैं जिया ने सासूमाँ को फिर एक जवाब दिया।इतना सुनते सासूमाँ काँटो तो खून नही।किचन में झटपट झूठ मूठ का कभी डिब्बा पटकती कभी बर्तन।भुनभुनाती रही लगातार पता नही किस मनहूस को घर ले आए,खुद को महारानी समझती है इनको सर पर बिठा कर रखों। क्या रोज रोज का लय बांध ली है आपने मम्मी जी जिया ने जवाब दिया। कभी किसी बात पर कभी किसी बात पर हर रोज बहस कर ही लेती हैं।आज इतनो सालो की कुंठा खोल दी तो बुरा लग रहा। जरा सोचिए मैं भी  एक स्त्री हूँ मुझे भी पीड़ा होती है। मगर इतनो सालो में कभी उफ्फ्फ भी ना कि आज थोड़ा जवाब क्या दे दी आपने तो मुझे मनहूस मान लिया; और वैसे भी मम्मी जी बिना इज्जत के आपको भी सासूमाँ का पद यू ही तो नही मिल गया।थोड़ी खरी कम रहती तो आप भी माँ के पद का इज्जत पाती। अरे भाड़ में जाय ऐसा पद... जहां कोई इज्जत ना हो। हाहाहा...आप भी आखिर मेरी बात मान ही ली जिया ने मम्मी जी को गले लगाते हुए बोला।

इज्जत बहुत बड़ी बात है मम्मी जी पद से भी ज्यादा। अब देखिए ना रोजका ही ले लीजिए ...पूरे दिन किचन में रहो और गर्मी में खड़े होकर सबकी अलग अलग फरमाइश का नाश्ता तैयार करो। उसमे भी उसके नाक मुँह सिकुड़ जाते है। जिसको जितना जी चाहा सुना लिया। किसी को नाश्ते के पराठे में तेल ज्यादा दिख जाएगा। किसी को नमक ज्यादा पता लग जाएगा और किचन में खाने को यू पटक निकल जायेगा मानो सारा दोष खाने का है। किसी को देखो तुरत ही उनकी फरमाइश बनाओ तो नखराते हुए बोलेंगे ये क्यों बना दिया अरे कभी तो पूछ कर बनाया करो हर चीज में अपना। ऐसी अनगिनत ताने और तेवर में दिन के शुरुआत से सुनना शुरू करती हूं और रात को जब सब काम निपटा कर पहुँचती हु तो पतिदेव का नाक मुँह फूल जाता है। करती क्या हो जो रोज रोज थक जाती हो। तुम्हारा पति हूं, अरे पत्नी धर्म थोड़ा निभाओ मेरा पैर दबाओ।ये है पूरा दृश्य जिससे में कम ही नही अधूरा ही बता रही। कभी किसी ने पूछा कि तुम भी थक गयी होगी। आराम कर लो। या किसी ने कभी ये सोचा हम सब उससे खिसिया के बोलते है उससे भी बुरा लगता है। उससे भी प्यार,दुलार की जरूरत है।सम्मान इज्जत की जरूरत है नही सोचा,ज्यादा दूर क्यों जाऊ अभी तो आपने ही जवाब दिया कि मैं कौन सा बहुत  बड़े पद पर हु,एक दिन किचन छोड़ देती हूं तो किचन का शोर पूरे घर मे गूंज जाएगा। खैर छोड़िये मैं भी किस्से अपना दुखड़ा कह रही जो रोज सुबह ही सुर बांध लेती है तानो की। मम्मी जी मुझे भी पीड़ा होती हैं। मुझे भी सम्मान से जीना है ना कि दुत्कार भाव से। बहू हूँ नौकरानी नही!इतना कह कर जिया वापस से अपने काम मे लग गयी। सासूमाँ समझ चुकी थी सब कुछ वो भी चुप हो कर बाहर चली गयी। 

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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️