ससुराल के व्यंग्यबाण | कहानी -5


जी जी ठीक है,अरे आपलोग आइए आपलोगो का स्वागत है भाईसाहब। मैं..... मैं ..मैं अभी अवन्तिका को भी बता देता हूँ। जी जी ठीक है।पापा ने फोन रख दिया। मैं पापा की खुशी को साफ साफ महसूस कर रही थी ,उनकी जुबा खुशी से लड़खड़ा रही थी।मगर ऐसी कौन सी खुशी आ गयी।  उन्होंने मेरा हाथ खिंचा और अपने सीने से लगा माथे को चूमते हुए बोले ,मेरी बच्ची।तभी माँ आ गयी किचन से अरे वाह, वहाँ मैं हूं गर्मी में खड़े हो किचन में पकौड़े तल रही और यहां आप दोनों गप्पें लगा रहे। अरे अवन्तिका गप्पे नही लगा रहा,पापा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। अच्छा तब क्या कर रहे आप दोनो बाप -बेटी मां ने  टोकते हुए पूछा। अवन्तिका अपनी रुचिका सोहम को पसंद आ गयी है। पापा की इतनी बात सुनते ही माँ खुशी से झूम उठी क्या सच! हे लड्डू गोपाल मुरलीमनोहर मेरी बेटी सदा उस घर मे सुखी रहे,यही आशीर्वाद दीजिए। सोहम कौन है पापा मैंने तपाक से पूछा। सोहम तेरा होने वाला पापा ने खुशी में बताया। मगर मुझसे बिना पूछे ही आपने इतना बड़ा निर्णय ले लिया। रुचिका अब हम तुझसे पूछकर निर्णय लेंगे की हमे क्या करना है क्या नही। वैसे भी बाप मैं हूं,तू नही। मगर पापा, बस चुप कल वो लोग आ रहे मुझे कोई नाटक नही चाहिए पापा अपना फरमान सुना कमरे में चले गए। माँ भी वापस से किचन में चली गयी।

आज ऐसा लग रहा था अपने ही घर मे बिल्कुल अकेली हो गयी हूं। ऐसा क्या है उस लड़के में जो सब मेरे साथ इस तरह बर्ताव कर रहे।मैं भी रूम में आ गयी बिस्तर पर लेटे लेटे यही सोचती रही कि कौन है सोहम। अभी तो मैं और पढ़ना चाहती हूं। इस तरह बीच मे शादी कर देने का क्या मतलब।मैं पापा से बात कर लेती हूं। मगर वो कहा मानने वाले।तभी माँ किचन से आवाज लगाई अरे रुचि जरा ये पकौड़े अपने पापा को दे आना। जी आई माँ। माँ...ये ले सजा कर प्लेट में लेकर जा। माँ सुनो ना,अरे ये कैसे अनमने तरह से तू पकौड़े रख रही । कल को ससुराल जाना है लोग क्या कहेंगे माँ ने तो कुछ सिखाया ही नही। माँ मुझे नहीं जाना। माँ ने हाथ पकड़ते हुए कहा देख रुचि तू अपने पापा से इस तरह कुछ मत कह देना वरना तू तो उन्हें जानती है ना जितने नरम है उतने ही गर्म भी। माँ मैं अभी पढ़ना चाहती हूं, और पापा को एक बार तो मुझसे पूछना चाहिए ना कि मैं शादी के लिए तैयार हूं भी या नही। तेरे पापा को भनक भी लग्गयीं ना तेरी इन फालतू बातो की तो ना तेरी ना मेरी खैर रहेगी। लड़का बहुत अच्छा है रुचि तभी तो तेरे पापा भी बहुत खुश हैं।वैसे भी कल सब साफ हो जाएगा। माँ ...अब जा पकौड़े लेकर वरना सोचेंगे कि अभी तक पकौड़े नही बने। तभी पापा किचन में आ गए क्या बात है अभी से माँ बेटी को सीख दी रही। बहुत खूब मेरे पकौड़े दो भाई अवन्तिका, माँ ने मेरे हाथ से लेकर पापा को थमाया। बहुत करारे बने है। अच्छा कल वो लोग आ रहे है सब लिस्ट तैयार करदो तो मैं मार्केट से सामान ला दूंगा। जी ,खाली होकर देती हूं माँ ने जवाब दिया। सारी तैयारियां जोरों पर थी ,सुबह से ही माँ शोर मचाने लगी अरे हल्दी बेसन लगा ले थोड़ी चेहरे पर चमक आ जाएगी। माँ जैसी हू वैसे ही ठीक हूँ। रुचि अच्छा जा साड़ी पहन लें। वो लोग अब थोड़ी देर में आने वाले है पापा ने चहक कर कहा अवन्तिका जा कर रुचिका को अच्छे से तैयार कर दे ताकि कोई कमी ना रहें। आपभी कितना परेशान हो रहे माँ ने पापा को टोकते हुए कहा-और मेरे पीछे पीछे कमरे में आ गयी। ये साड़ी पहन खूब जंच रही तुझपर। ह्म्म्म ,माँ। देख रुचि अब कोई ड्रामा नही। वरना तेरे पापा बिल्कुल ही नाराज हो जाएंगे। जी ।

कुछ देर में पूरे परिवार के साथ सोहम आ गए। मैंने चुपके से खिड़की से झांकते हुए देखा तो दस पंद्रह लोग आए हुए थे। बाप रे इतने लोग। तभी माँ कमरे में आने लगी मैं सीधे खड़ी होकर पल्लू को ठीक करने लगी। बेटी रुचि ये सोहम की मम्मी जी नमस्ते। अरे पैर छुओ बेटा ,जी। अरे अवन्तिका भाभी इतनी फॉरमैलिटी की क्या जरूरत है।बहुत सुंदर है आपकी बेटी।आओ बेटा बाहर।जी बहुत नर्वस होती जा रही थी। मैं भी सबको हाथ जोड़कर नमस्ते कर ली। सामने सोफे पर दो लड़के बैठे थे दोनो ने ही हाथ हिलाकर हाय किया मैं बिल्कुल सन्न रह गई सोहम कौन है। तभी मम्मी ने खाने के लिए बहुत सारे नाश्ते मौसी के हाथों भेजवाया। अब शुरू हुई मेरे क्लास की बारी। क्या पढ़ी हो क्या करना है। लंदन में सोहम के साथ रह लोगी ना। मैंने सर हिल्ला दिया। भाईसाहब हमें तो आपकी बेटी बहुत ही पसन्द है। सर पर बिठा कर रखूंगी बिल्कुल आपकी तरह कभी उफ्फ्फ भी नही करेगी। अरे भाभी जी कैसी बात कर रही। बच्चे खुश तो माँ बाप को और क्या चाहिए। सोहम की मम्मी ने झट से सोहम को इशारा किया और वाइट् शर्ट ग्रे पेंट कोट पहने सोहम खड़े होकर मेरे तरफ हाथ बढ़ा दिए। मैं चुपचाप समझने में ही लगी थी कि माँ ने तुरंत मेरा हाथ उनके हाथों में थमा दिया। सोहम ने कोट से रिंग का डिब्बा निकाला और मुझे पहना दिया। बिना मेरी मर्जी जाने चट मँगनी पट ब्याह वाला हाल हो गया। मगर इन सबमे माँ पापा की खुशी देखने लायक थी। कुछ ही दिनों में शादी हो गयी। कुछ दिन तो मैं कानपुर रही फिर सोहम के साथ लंदन।वहाँ शुरू में तो बहुत परेशानी हुई। लेकिन धीरे धीरे मैंने भी उसी माहौल में खुद को ढाल लिया। रोज का बार- पार्टी जाना ,छोटे कपड़े पहनना ,शराब पीना आम होने लगा। उन्ही बीच सासूमाँ लन्दन आ गयी। उन्हें ये सब रास ना आया। एक दिन उन्होंने मुझसे कह ही दिया, अरे रुचिका ये रोज रोज पार्टी ,शराब ठीक है क्या। तकलीफ मुझे भी हुई मैंने भी कह दिया मम्मी जी सही तो नही है मगर मैं तो सिर्फ पति धर्म निभा रही हूं। इसमें क्या बुराई है । मम्मी जी बीच मे टोकते हुए कही सोहम के पापा भी है अरे कुछ तो लिहाज रखना चाहिए, कम से कम कपड़े तो पूरे पहन लो कुछ दिन तो ही हम आए है। मेरे आंखों से आँसू छलक गए। मम्मी जी इन कपड़ो ने मुझे कितनी तकलीफ दी है वो आप नही समझेंगी। कितने कष्टो के बाद मैंने ये रूप धारण किया। रोज रोज की मारपीट ,बात बात पे मेरे कपड़ो को लेकर नीचे दिखाना। खान पान सब चीज में टॉर्चर आप कहती है मैं शर्म करू। वैसे भी मम्मी आपको तो मैं हर रूप में स्वीकार थी,फिर ये उफ्फ कैसी?

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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️