कसौटी आध्या की!


ये इश्क़ की ममता है साहब,कहा इतनी आसानी से छूटेंगी।मोहब्बत तो वो गुनाह है जो कबूल कर के भी नाकार जाएं!कहानी लिखी नही जाती ,हालत अक्सर उन्हें जन्म दे देते है,और फ़िर!फिर  क्या शब्द उन्हें पिरो देते है। कुछ इसी धुरी पर ये कहानी है जो दोस्ती,प्यार,टकराव, परिवा........र यही तो वो शब्द जिन्होंने हमे जुदा कर दिया। परिवार.........जहाँ परिवार होता है प्यार में वो रिश्ते अक्सर बिछड़ जाते हैं!एक ऐसा बिछड़न जहाँ दो दिल बिछुड़ तो गए मगर बिछड़ के भी ना बिछुड़ पाएं।

खिड़की से ताकते उस नन्हें तारे ने एक ऐसा सवाल पूछ लिया, मानो जिंदगी की बीती बात पिक्चर हाल में लगी फिल्मों के रील में लोड हो गयी हो। डब -डबाते आँसू निकल पड़े उन दूर तलक की यादों में जो दस साल के बाद दस  मिनट में ही यू अलविदा बोल गए पता ही ना लगा...!
जिनके लिए हम रोते है,
वो किसी और के बाहों में सोते है!
हम जिंदा गए करीब उनके
अब देखो मरे हुए लौटे हैं,
कभी यहाँ बात करते हो
कभी वहाँ बात करते हो
आप बड़े लोग हो साहब
हमसे कहाँ बात करते हो,
वो जो कहते थे हम इकलौते हैं
वो किसी और के बाहों में सोते है!

आध्या आँखे मूंद रो पड़ी पतिदेव मिहिर ने आध्या के कन्धे पर हाथ रखते हुए हिम्मत दी। आध्या चौक कर उन सपनों के भंवर से निकल गयी और पति को इतने करीब देखते हुए आंसू को छुपाए तो अब छुपाए कैसे। याद आ रही,आध्या ने सर नीचे झुका लिया। नही बस वो कुछ नहीं!मिहिर ने आध्या के हाथों में एक डायरी थमाते हुए बोला,लिख दो जो जो जहन में हो ताकि तुम फिर जी सको आध्या। मिहिर ऐसा नही है कुछ। आध्या मैं तुमसे ज्यादा किसी को नही जानता जो लड़की पहली मुलाकात में साफ स्प्ष्ट बोल दे हर बात को खुलकर शेयर करे,उसके पास सब है मगर वो नही जिसका तुम्हे आज भी इन्तेजार है। ये बोलकर मिहिर वहाँ से वापस सोने चले गए। आध्या ने चंद्रमा के रोशनी में उस डायरी को देखना चाहा वो एक लाल रंग में लॉक डायरी थी। आध्या ने उसी रात उस पर लिख डाला...कसौटी आध्या की!

मैंने भी एक ख़्वाब देखा था,वह राजकुमार ना सही,लेकिन मेरे दिल का वो राजकुमार होगा।बचपन की वो सिंड्रेला, उसके प्यार के खूबसूरत पल बेह्द खूबसरत ही तो थे।मैं भी एक ऐसे ही राजकुमार का इंतजार कर रही थी जो आए मुझे अपने सफेद घोड़ो पर बिठा सबकी नज़रों से चुरा ले जाए।मेरे दिल का हाल बिन बया किये सबकुछ समझ जाएगा।उसकी दुनिया मैं, मेरी दुनिया वो बन जाएगा। जिसकी हर ख़ुशी मुझसे होगी,जिसके पास मैं खुद को बहुत महफूज पाऊँगी,जो मुझसे प्यार करेगा,मैं उससे प्यार करूँगी।अक्सर सिंड्रेला की कहानियों में खुद को महसूस किया करती ,जब मेरा राजकुमार आएगा तो वो भी हूबहू ऐसा ही तो होगा। सपनो के मकड़जाल में कौन कभी पूरा हुआ है। किसी ने जाले को तोड़ दिया,तो फिर मकड़ी को दुबारा घर बनाना पड़ता है।

मैं भी तो ऐसी ही हूँ! एक तरफ़ मोहब्बत, दूसरी तरफ़ दूरी...!तीसरा जिसकी कल्पना से परी थी वो थे,मिहिर।घर पर सब खुश थे इस रिश्ते से मैं भी खुश थी,मगर मिहिर से अपनी बात कहना चाहती थी। उसे ये अहसास नही होने देना चाहती थी कि मैं उसे बाँट रही।बस अपने प्यार और मिहिर की जगह बनाए रखना चाहती थी। प्यार का मकड़जाल तो परिवार वालो ने कब का तोड़ फेंका था कही दूर। बस अब वक़्त था मिहिर के घर को बसाना। जहाँ हमारी दुनिया हो,प्यार हो खुशी हो,इससे ज्यादा कुछ भी नहीं!मगर ये दिल कहा मानने वाला ,इश्क़ जो पहली दफ़ा कर बैठा!

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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️