हाई डिमांड "बहू-बेटी जैसी"????

.....?????"बहू बेटी जैसी चाहिए????
क्या हुआ आप भी भौचक्के रह गए न ,भइया आजकल अलग अलग तरह कि डिमांड शुरू हो गयी है। यह सुनते मेरे मन मे भी लाखों प्रश्न उमड़ते बादलों की तरह गरजने लगे कि ये कैसी डिमांड???

बहू- बेटी जैसी.???आख़िर एक स्त्री पर इतना बड़ा प्रहार क्यों???? आख़िर एक बहू को ये बताना क्यों कि तुम बेटी जैसी नही???? भाई साहब आप अपनी सोच खुद ही क्यों नही बदल लेते, कि बहू भी बेटी जैसी ही दिखे!

जब तक आप नही बदलेंगे न  , तब तक बहू -बेटी  जैसी बन ही नही सकती। वो कितना भी त्याग क्यों न कर ले आप उसे आख़िर में ये बता के रहेंगे कि "बहू हो बहू की तरह रहो" ज़्यादा हर बात पर अड़ने की जरूरत नही..!

मैं ये इसीलिए कह रही क्योंकि मैंने इस तरह के लोगो को देखा है जो बहू को बेटी बनाने में जुटे जरूर रहते है ,लेकिन किसी न किसी दिन ये बता ही देते है कि तुम इस घर की बहू हो । अगर बहू ने भी बेटी बनकर रहना शुरू कर दिया न तो निश्चित आपका हाजमा उसी दिन से खराब होना शुरू हो जाएगा।

हर छोटी सी छोटी बात भी आपको चुभने लगेगी। जैसे :- बहू किसी बात पर जिद्द करे तो ताने मार देना,बेटी जिद्द करे तो उसे पूरा कर देना। बहू कुछ पहने तो बुरा मान जाना, बेटी पहने तो तारीफ की लरी लगा देना। ऐसी ही न जाने कितनी बातें है जो जिसे आप ख़ुद वाकिफ़ है। लेकिन ये बात तो साफ है कि आपके इस डिमांड पर कोई बहू बेटी नही बन सकती,क्योंकि ये आपकी सोच है,न कि बहू की??

एक बहू को तो बख़ूबी पता होता है कि बेटी तो वो अपने आँगन की होती है ,जहाँ उसे उड़ने की पूरी आजादी होती है, उसके फरमाइश से लेकर उसके दुःख तकलीफों तक। लेकिन बहू उस घर की हो जाती है ,जहाँ दिनोरात एक कर के सबको खुश करने में ही वो लगी रहती है। सबके पसन्द न पसन्द को समझने , ओर दुसरो की खुशी में खुश रहने, में जुटी रहती है। बड़ी बात पता आपको एक बेटी बहू बनकर बेटी क्यों नही बनना चाहती, क्योंकि जो सुकून उसे अपने घर मे मिलता है वो ससुराल में नही। जो सुकून उसके माँ अपनी परवरिश ओर लाड़ प्यार देती है तो पिता की  दुलारी भाई का बॉडीगार्ड बनना, बहन का नोकझोंक ओर प्यार दुलार वाला रिश्ता,बहुत कम लोगो को ही ससुराल में नसीब होता हैं। कि देवर आपको भाई जैसा लगे,ननद बहन जैसी,सास माँ जैसी ,ससुर पिता जैसे।
मैं ये नही कहती कि ऐसे लोग नही लेकिन मैं ये जरूर कहूँगी कि 10%लोग ही है जो बहू को बेटी बना कर रखते हैं। आपने कभी ये डिमांड करते वक्त ये सोचा कि "जिस स्त्री का हम तोलमोल कर रहे ,बहू बेटी जैसी हो ये डिमांड रख रहे तो ये भी जरा सोच लिए होते की वो एक स्त्री है जिसके ऊपर आप इतना बड़ा प्रहार कर दिए।

उसके अस्तित्व पर वार करने से पहले ,यदि आप ही एक बहू को बहू का दर्जा दे देते तो उस दिन इन सवालों के प्रहार मायने नही रखेंगे।

जिस दिन आप ये सोच लेंगे की वो भी किसी घर को छोड़ आपकी क्यारी में लगने आई है ,जब आप ही उसे उसका उचित स्थान नही देंगे तो कैसे एक बहू - बेटी जैसी खिलेंगी ज़रा आप ही बताइए??


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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️