बिन सजना न भावे सावन



काले बदरे ,ओर रिमझिम फुहार...मोर के पंख सावन के झूले,गरजते बादलों में आपसी बातचीत ओर तुम ओर मैं।क्या तुम मुझे फिर अपने रंग में मुझे रंगोंगे मेरी रूह को तुम छुओगे। क्या हम चमकती बिजली के डर से एक दूसरे से फिर लिपट लिप्त हो जाएंगे।

रूही अपनी खिड़की के ग्रिल से सिर टिकाए ,खुले आँखों से उसे महसूस कर रही जिसे वो कब का खो चुकी है। उन कड़कती बिजली और गरजते बदलो से कुछ अपनी भी कहने की कोशिश कर रही।
तेज वर्षा ओर रूही एक दूसरे से कह अपने आंसू को व्यक्त करने की कोशिश। ए बादलों सुनो आज में असहज कमजोर महसूस कर रही,न जाने क्यों उनकी हर यादे घूमती है,उनकी मुलाकात,पहली बरसात की मुलाक़ात जब हम और वो एक साथ भीजे,तन मन से एक दूसरे से समर्पण होते नजर आए। हर शर्म शान्त सी बन गयी जब हम एक दूसरे के करीब आए।

वो पहली बरसात, एक दूसरे का साथ कितना नया था सब। कभी ख्वाबों में न सोचा कि हम एक दूसरे को स्पर्श करंगे। एक ऐसा स्पर्श जहां सब कुछ शान्त था। एक ऐसी आहट जहाँ आंतरिक सुख के दरवाजे खुलकर साँसे ले रही थी। उनका करीब से माथे पे एक गर्म चुंबन जिसे साँसे ओर भी तेज हो गयी। दूर होते हुए भी हम बेह्द नजदीक थे। आज शर्म का आइना खुल गया था। हम एक दूसरे के हवाले से हो गए। इन्ही कड़कते बादलों की वजह से। सब कुछ अनजान बेह्द दिलचस्प था सब कुछ मगर आज सबकुछ कहानी सी लगती है मेरे साजन।

आज भी मैं सावन के इस पानी मे भीग रही,तेज हवाओं से कांप रही लेकिन तुम मेरे साथ नही। दिल के हर दरवाजे तुम्हारी दस्तकों को निहार रहे। भिज रही उन्ही गोतो में जहाँ हम आपको मिले आप हमें मिले।

ह्म्म्म,सावन के झूले,और वो हर सावन के माह में भोले के दर्शन कितना रोमांचक था सब कुछ कैसे कहूँ,भोले के दर्शन तो एक बहाना सा था,असली मिलन तो आपसे होती थी। हर बारिश में मुझे भीगने से बचाना मेरी केयर,सावन लगते मेहदी लगवाना ,हरी चूड़ियां से मेरा श्रृंगार करना। मेरा मुस्कुराना ही आपके दिलो को भिगो देने के बराबर था।

सावन के नजदीक आते ही एक लम्बी सी लिस्ट आपको व्हाट्सएप करना,जिसमे साजो श्रृंगार से जुड़ी होती थी फरमाईस। आख़िरी के शब्द कुछ यूं होते थे,बीवी हूं तुम्हारी। कभी तो बिन लिस्ट तैयार रहा करो। आपसे ही साजो श्रृंगार है,सब कुछ।

तेज बारिश में गरमा गरम चाट खाना,भुट्टो का आनंद लेना। तेज घुड़कते बादलों से डर कर एक दूसरे से लिपट जाना। सब कुछ कितना नया था। पता नही आपको याद भी है कि नही आपका पहला प्रपोज भी बेहद खूबसूरत था। ऐसा लगता था सबकुछ भगवान का दिया हुआ है। मगर आज सब कुछ साफ है हम एक दूसरे के तो नही मगर एक दूसरे के करीब हर पल है। जानती हूं तुम खामोश जरूर हो मगर मेरी याद तो हर पल चुभती होगी न।

कैसे भिजु बिन साजन सावन में। कैसे करूँ श्रृंगार बिन साजन सावन में। किसके नाम की मेहंदी लगाऊँ इस सावन में। अब तो ये मौसम भी नही भाते,सच कहूँ प्रिय तुम बिन न भावे ये सावन।


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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️