उफ़्फ़.... ये चार लोग ?

ये चार लोग नही मिले जिन्हें जिंदगी में मानो उनका जीवन फ़लसफ़ा हो गया। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं किन शख़्श की गुफ्तगू कर रही हूँ, जनाब ये वो चार लोग है जिन्होंने हमारे पर्सनल जीवन को झंड बना कर रखा हुआ है। आप भी सुने ही होंगे चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?अब याद आगये ये लोग आपको ,जरा आप भी याद कीजिये कि इनके रहने से आपके जीवन मे कितना घाटा कितना मुनाफ़ा हुआ अभी तक??


मगर सच कहूँ, मुझे आज तक वो चार लोग नही मिले जिन्हें देख कर हमारे घर वाले अक्सर मुँह भौह सिकोड़ यह कहते है कि चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे? अब आप ही मुझे यह बात स्पष्ट करे कि मैं कितनी सही कितना गलत माप रही। मुझे लगता है कि जिन चार लोगों की बात वह करते हैं उन्हीं चार लोगों में वह खुद भी आते हैं।


अब देखिए न आज के समय में कोई भी इंसान ऐसा नही , जो दूसरे इंसान की खिल्ली न ले।हर कोई दूसरे की गल्तीयो को एक का चार लगा बताता फिरता है ,इसीलिए हमे वही करना चाहिए जो हमे सही लगे वो नही जो समाज को अच्छा लगे। ओर ये समाज कौन है जरा सोचिए हम ही आप न , हम ही आपसे तो ये समाज बना है तो समाज को बदलने की क्यों सोचें।


मैं भी एक ऐसे ही परिवार से पलीबढ़ी हु जहाँ लड़कियों को हर समय लिमिट्स में रहना सिखाया जाता था । बचपन से ही सरल स्वभाव , सुशील होने के गुण, हर कार्य मे निपुण, या यूं कहें तो हमेशा से ही दूसरों के हिसाब से जीना सीखा दिया जाता है इस उम्र के पाठशाला में।


मैं जितनी सरल स्वभाव की तो, दूसरी तरफ़ उसकी छोटी बहन खुली सोच और ज़िंदगी को अपने हिसाब से जीने वाली।   संध्या हमेशा यही सोच के रह जाती कि जब वह बड़ी हो जायेगी और अपना कैरियर बना लेगी तब वह अपनी सारी ख्वाहिशें पूरी करेगी और अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीयेगी।संध्या को हमेशा से ही उठने बैठने के तौरतरीके से लेकर , ढंग से कपड़े पहनने तक के लिए राय दी जाती थी, कभी उसने पलट कर कुछ बोल दिया तो आ जाते थे बीच मे दीवार बन वही चार लोग जिनसे न उधव का लेना न माध्व का देना।


कहते है न जमाना आगे बढ़ गया लेकिन सोच वही कि वही अटरिया पे धरी की धरह रह गयी...!का फायदा जमाना बदले का जब , ई चार लोग जीवन मे न सुधरिये।


इन्ही के वजह से न जाने कितने घरों में क्लेश फूट  जाता हैं।


लेकिन देखा जाए न , न तो इनका कोई इसमें फायदा होता है न कुछ , बल्कि हम खुद अपना नुकसान कर बैठते है।


यही सोच सोच की चार लोग देखेंगे या सुनेंगे तो क्या कहेंगे।

अक्सर हम लाखों

परेशानियो से  होकर गुजरते है,यहाँ तक कि  नौकरी छोड़ने तक का मन बना लेते है, लेकिन नही छोड़ पाते,जैसे तैसे नौकरी और सारी परेशानियों के बीच की पोटली अपने सीने में दफन कर, सामंजस्य बैठाना सीख लेते हैं।
यह मैसेज उन चार लोगों के लिए है जो दूसरे के घर बिन माचिस चिंगारी देने का काम करते है। बदलते परिवेश में लोग आज के समय मे अपनो को देखने और सम्भालने के बजाय दूसरों पर बिन उंगली किये नही मानते।


बरहाल,मेरी तो खोज जारी है उन चार लोगों की जो हर रोज उंगली किये बिना ,नही मानते।अगर मेरे खोज से पहले आपको मिले तो मुझें भी जरूर से बताइएगा नही मिलवाएगा।



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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️