साइलेंट लव

मेरी शादी होने वाली है अगले महीने तुम समझों रूही, तुम भी तो समझों मैं बिन तुम्हारे आवाज के जी नही सकती स्पर्श। कौन सा मैं तुम्हारे मंगनी को रोक रही .?.कौनसा तुम्हारी शादी को रोक लूँगी? कौन सा तुमसे जबरदस्ती कर लूँगी? क्या हमारे बीच इतनी दूरी जरूरी हो गयी है कि हम एक दूसरे को जी नही सकते तो हालचाल भी न जानें? बस इतना सा था हमारा प्यार ,हमारा रिश्ता? रूको स्पर्श रुक जाओ...रूही रोते हुए टूट कर बिखर गई ...रुक जाओ...ओऊऊऊ.....


          आँसू के भंवर में डूबी रूही स्पर्श को बार बार महसूस करने की सोच रही थी ,उसकी आख़री खुशबू को अपने भीतर समेटते जा रही थी, बीते आखिरी हर पल को बार - बार ,हर- बार रिमाइंड कर रही थीं..तेज बारिश ठंड हवाओं की सनसनाहट ने अल्फ़ाज के पन्नों पर रूही के नम आँखों ने स्याह की बूंद को भिगो कर रख दिया था...! सपने सुनामी में डूब रहे थे। मगर न तो वहाँ कोई टापू था न ही कोई  किनारा बस थी तो लहरें....! जो दस साल की यादें एक बार मे ही सबकुछ निगल लेना चाहती थी। जिस मंज़र को रूही चुपचाप देखते जा रही थी।

हम्ममम्मममम्ममम्म....... मैंनू पता है तू प्यार करदा,मगर कहदा कि करता ही नही.....रेडियो की धुन रूही के ध्यान को और नम आँखों को कोरे जिंदगी को एक पन्ना थमा दिया।

"तुम चाहें बन्द कर लो हमारे लिए अपने दिल के हर दरवाजे,


मगर हम तो फ़िर उतर ही आएंगे दिल मे अपने अल्फ़ाजो के सहारे"। प्यार के दिन गुजारना आसान नही, बहुत ज्यादा आसान होता है कब दिन कब रात फिर कब अगली सुबह ने दस्तक दे दी पता ही नही चलता। मगर जब दिल टूटता है तो न दिन होता है न शाम आती है न ही अगली सुबह चहक के कहती है, गुड मॉर्निंग बेबी।


अब तो तुम बिन सुबह की कॉफी भी फ़ीकी होती जा रही। किसी ने दरवाजे पे दस्तक दी खट खट;  रूही उठ जाओ सुबह हो गयी....मगर रूही तो न जाने कितनी रातों से सोई ही नही। फोन के स्क्रीन पर लॉक खोलती बन्द करती शायद कोई ऐसा मैसेज आया हो जिसपे स्क्रीन पे दिख न रहा हो। दिन गुजरते जा रहे थे,धीरे धीरे महीने - भी गुजरते गए अब तो साल की बारी आ चुकी थीं। रूही मुरझाए हुए पेड़ की तरह कोने में पड़ी रहती, लोग आते ,उठते - बैठेते ,हस्ते - बतियाते मगर रूही उनके पास होते हुए भी नही होती। स्पर्श के उस आखिरी स्पर्श को महसूस करने में लगी रहती। साल भी लगभग गुजरते जा रहे थे। इधर रूही के रिश्ते की भी बात चलने लगी लेकिन रूही की चहक वो खुशी सब कही किसी पुराने बक्से में बंद हो चुकी थीं। जिन्हें वो शायद खुद नही खोलना चाहती थी।


न जाने क्यों उसे हर बार, बार- बार यही  महसूस होता कभी तो कभी तो उसके मोबाइल की बत्ती ये बोलने की कोशिश करेगी जिसका तुम्हे इन्तेजार था वो तुम्हारे पास है।शायद बहुत पास। मगर वो दिन नही आए, शादी के बातें चलने लगी गुमशुम सी रूही रुई की फाहे की तरह कही गुम होती जा रही थी।


आज रूही की मंगनी थी,सुबह से ही रूही मोबाइल का लॉक खोलती और स्पर्श के नम्बर पर एक मैसेज ड्राप करना चाहती। मगर स्पर्श के आखिरी अल्फ़ाज रूही को लिखने की हिम्मत ही नही देते। रूही रूही... रूही की दीदी उसके बहुत करीब खड़ी थी," क्या हो गया मेरा बच्चा..."दीदी के बस इतने अल्फ़ाज से रूही पिघल सी गयी इतने सालों के दर्द को आज उसने घिघियाते हुए रोकर बाहर निकालने की कोशिश कर ही दी आख़िर। दीदी ने सम्भालते हुए कहा, याद आ रही। ह्म्म्म रूही- बहुत। बात करोगी- रूही ने निगाहें ऊपर की दीदी को चुप चाप सिसकते हुए देखने लगी,सर को हिलाते हुए कही,हम्म्म्म! दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, पहले चुप तो हो जाओ..; हम्म्म्म रूही ने जवाब दिया।


दीदी ने रूही का मोबाइल लॉक खोलवाया और मिला दिया कॉल... एक घण्टी में ही किसी ने झटसे फोन उठा कर कहा,कैसी हो रूही?रूही स्पर्श की आवाज सुन रो पड़ी,जी भर के दोनों ने बेइंतहा रोया ,और फिर क्या एक बार फिर दोनों की बहस उसी तरह हो उठी जो सालों पहले किसी बक्से में रुही ने बन्द कर दिए थे। तुम तो मुझे याद ही नही करती रुही ? ....मैं तुम्हे क्यों याद करू;जबकि तुम तो मुझे बिल्कुल नही याद करते। न तो पहले की तरह प्यार न ही प्यार के बाद की दोस्ती स्पर्श। तुमने तो दोस्त के दर्जे से भी मुझे हटा दिया। तुम सामने आ जाओ तो भी तुम्हें न देखूं..! स्पर्श ने रोते हुए कहा, तुम्हारे पास बहुत पास ही हु आज भी रुही। स्पर्श तो तुम्हारे पास ही रह गया सालों से; यहाँ तो बस एक जिम्मेदारी चल रही।

स्पर्श ने पूछते हुए कहा, तुम्हारी मंगनी है न आज तुम इतना क्यों रो रही रुही ,क्योंकि तेनु पता है कि मैं प्यार कर दी स्पर्श...स्पर्श ने मुस्कुराते हुए आवाज से कहा ,ह्म्म्म तो फिर मेरा दिल आज रोना कैसे सिख गया। स्पर्श ने रुही को समझाते हुए कहा; ये लड़ाई है रुही ,जिसमें अब तुम्हारी बारी है खुद को संभालने की।

रही बात हमारी तो हम साथ थे ,साथ रहंगे हमेशा। ह्म्म्म -रुही की आवाज चहक से वापस मुरझा गयी। काश उस लल्लू की जगह तुम होते स्पर्श,तो मैं कभी नही रोती। स्पर्श ने रुही को समझाते हुए कहा क़िस्मत की चाहत यही थी रुही। मगर तुम आज भी मेरे लिए उतनी ही अजीज हो जितनी पहली थी। रुही ने रोते हुए कहा ;ओ मेरे साइलेंट लव आई लव यू फॉरएवर।

रुही की मुस्कान चन्द मिनटों के लिए वापस आ गयी,क्योंकि रुही ये जान चुकी थी उसका प्यार उसके साथ ही है आज भी.......

तेनु पता है कि मैं प्यार कर दी।

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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️