चिता भस्म की होली !



बहुत हुई रंग और गुलाल से होली
दोस्तों आज आप चलो अपनी घुम्मकड़ लड़की के संग काशी में  खेलने टोलियों के संग चिता भस्म की होली!

दिन सोमवार,
घड़ी में समय 11बज रहे थे ,उसमे जाम का ताम-झाम ,दो मिनट तो लगा आज तो देख चुकी ,मगर कहावत तो आप सबने सुनी ही होंगी,भोले से मिलना आसान नही...तो उनके साथ अल्हड़ी होली का आनंद लेना भला ये कैसे आसान हो सकता है!

समय बढ़ता गया देरी होती गयी फूल-एंड - फाइनल टोटो से उतर गदोलिया से पदयात्रा का अवसर शुरू हुआ। उसी बीच मैंने वो बहुत कुछ देखा जो देख दिल अत्यंत दुखी हो गया। बाबा विश्वनाथ धाम के बनने के चक्कर मे वो तमाम काशी खण्डोक्त मन्दिरों को कुछ यूं ध्वस्त कर दिया गया है मानो किसी ने किसी के सर से छत छीन लिया।

वो गलिया जहाँ लस्सी पी थी,कुछ महीनों पहले उसी के पास रुद्रेश्वर महादेव की मन्दिर थी,वो भी छतिग्रस्त। दो पल दिमाग को झटक आगे बढ़ी यही सोचते हुए की कुछ अच्छा होने के लिए ख़राब होना भी जरूरी हैं। यही सोचते हुए पहुँच गयी मणिकर्णिका के द्वार।

मातम में उत्साह का रंग यदि आपको देखना है तो वो कही और नही ,बल्कि काशी के मणिकर्णिका घाट पर देखने को मिलेगा।

शंखनाद,ढोल-नगाड़े,डमरू की गूँज उसमे हर हर बम बम की गूँज मानो पूरा वातावरण ही कुछ पल को मसान बाबा के साथ लिप्त हो गया हो। रंगों का त्यौहार होली का जश्न पूरे देश मे मनाया जाता है लेकिन काशी में होली मनाने का अंदाज कुछ अलग ही ख़ास।

शुरुआत बाबा मसान की भस्म आरती से होती है और उसके साथ ही शुरुआत होती है अस्मशान में गांजे बाजे ,ढ़ोल -नगाड़े के साथ चिता भस्म की होली।

धधकती चिताएं, अड़भंगी अदाएं,हवाओं में श्मशान के राख व भगवान शिव के भस्म और गुलाल के गुब्बारे से महज बीस - से - पच्चीस मिनट की ये होली कुछ पलों को हर किसी को मस्ताना बना देता हैं। देखा जाए तो अड़भंगी महादेव के अड़भंगी साथी व उनके भक्तगण भी जब बाबा के रंग में रंगने लगते है तो सबकुछ भूल जाते है,और जोश में कहते है आप का नेता कैसा हो भोले नाथ जैसा हो , जीतेगा भाई जीतेगा भोलेनाथ जीतेगा। हर हर बम बम ,हर हर बम बम ! रूमानी भस्म के माहौल में चुनावी गूँज लोगो मे और भी जोश ला दिया।

महादेव की धूम, अनोखी बारात, श्मशान पर अड़भंगी होली,चिता भस्म गुलाल के गुब्बार से कुछ पल के लिए फिज़ाओ में बदलाव। ये सबकुछ देखने लायक हैं। ढोल नगाड़ों,डमरू,गाँजे बाजे के साथ जब निकल पड़ते है विश्वनाथ अपनी गलियों से हुड़दंगियों के साथ मणिकर्णिका पे पहुँचते है और वही से शुरू होती है चिता भस्म की होली।
जिसमें भारतीय ही नहीं विदेशियों का भी उत्साह भी देखने लायक होता हैं। उस दौरान मैंने जो महसूस किया वो ये था कि न जाति-पाति का भेदभाव,  न धर्म के नाम पर किसी से मनमुटाव ये है अड़भंगी की नगरियां।

बड़ी बात तो ये है कि हम सभी की यात्रा तो श्मशान में जाकर ही खत्म होती हैं। लेकिन कहा जाता है कि जो भी शख्श चिता भस्म की होली खेले तो फिर वे मौत से नही घबड़ाते। इसी अड़भंगी होली को भुलाना आसान नही।

उसी दौरान मेरी मुलाकात बाबा विश्वनाथ धाम के महंत जी से हुई उन्होंने बताया ये परंपरा अनादिकाल से चला आ रहा है। जिसमे बाबा भोले रंगभरी एकादशी पर माँ पार्वती का गौना कराकर  लाते तथा अगले दिन मणिकर्णिका पे अपने भक्तों के साथ होली खेलते हैं। इसी मान्यता के साथ हर वर्ष शिवभक्त यहाँ जमा होते है और इसी के साथ शुरू होती है विधिविधान से पूजन-अर्चन, ढोल नगाड़ों व चिता भस्म गुलाल की वर्षा।

काशी की यही अदाएं व भक्तों का बाबा के प्रति प्रेम देखने लायक होता हैं जिसे विदेशी भी जम कर मजा लेते है। तो कैसी लगी आपको चिता भस्म की होली की यात्रा आप भी जरूर बताएं और आप सभी से आग्रह करूँगी की अगली वर्ष आप भी रंगभरी होली व बाबा मसान की होली जरूर देखें।

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तुम्हरी माँ ऐसी। तुम्हारी माँ वैसी। ...................................................................................................................................................................................................................................हा है बुरी मेरी माँ!बहुत बुरी...जिसने अंधेरी ठंड की घनघोर कुहासे वाली रात अपने बच्चों को लेकर रोती रही घर के दरवाजे पे। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद अन्न जल ग्रहण न किया मगर अपने बच्चों को दूध न सही पानी पिला के बड़ा किया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने खुद की जिंदगी और तमाम छोटी बड़ी खुशियों को दफना अपने बच्चों को बड़ा किया। हॉ है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने आँखों की रोशनी अपने बच्चों की जीवन मे रोशनी लाने के लिए गवा दिए।                         हा है बुरी मेरी माँ...जिसने कभी दुःख का दुखड़ा न रोया,बल्कि दुसरो के दुख को समझा। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने शौख अरमानों को बंद बक्से में कैद कर दिया। हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों में किसी चीज की कमी न की।  हा है बुरी मेरी माँ....जिसने दिन भर स्कूलों में पढ़ा...शाम को ट्यूशन पढ़ाते हुए घर की कमान संभाली। हा हा है बुरी मेरी माँ....जिसने लू के थपेड़े में शास्त्री ब्रिज पैदल पार किया।  हा है बुरी मेरी माँ...जो आज भी अपने बच्चों के लिए जान न्यौछावर कर रही। हा हा है बुरी मेरी माँ...जो घुट घुट कर रोती है।                    हा है बुरी मेरी माँ ....जिसने ठंडी हवाओं में वही स्वेटर से सालो गुजार दिए..बच्चों को कभी किसी चीज की कमी न की। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने तमाम ठोकर खाने के बावजूद उन तमाम रिस्तेदारों के फिजूली अपशब्द सुनने के बाद उन्हें आज भी प्रेम स्नेह से सम्मान करती है,उनके आने की खुशी पर क्या से क्या न कर दे उसके लिए हैरत में रहती है।  हा है बुरी मेरी माँ...जो तीन सौ रुपए में अपने बच्चों का पालन पोषण कर उनके ख्वाहिश ख्वाब को संजोती है। हा है बुरी मेरी माँ ....जो आज भी तमाम कष्टो से जूझते हुए उफ्फ तक नही करती। हा हा है बुरी मेरी माँ ...क्योंकि उसने सब सह लिया...।                हा है बुरी मेरी माँ..क्योंकि आज उसने अपने बच्चों को अपनी आँखों की रोशनी बना खुद की निगाहें कमजोर कर दी। हा है बुरी मेरी माँ....जिसने कभी किसी से शिकवा शिकायत नही की। हा है बुरी मेरी माँ...शायद बहुत बुरी जो खुद बीमार है मगर खुद को कहती है "मैं बिल्कुल ठीक हूँ"।                           हा है बुरी मेरी माँ...जिसने अपने बच्चों को न खाने में कमी की न रहन सहन में। हा है बुरी मेरी माँ....जो खुद कभी खुल कर रो न सकी।हा हा है बुरी मेरी माँ....जो अपने बच्चों को सबके आगे डॉट लगाती है।              हा है बुरी मेरी माँ...जिसने एक बेटी,एक पत्नी,एक माँ होने का फर्ज ही नही अदा किया बल्कि ...अपनी नन्ही परियो को जिंदगी के मायने ओर उसके इम्तिहान से जीतने का हौसला ओर डर का डट कर सामना करना सिखाया। मुझे गर्व है इस बुरी माँ पर...जिसने अपनी कोख से समझदार नन्ही परियो को जन्म दिया।गर्व है अपनी माँ पर...❤️